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Friday, April 15, 2016

सब्र का फल मीठा

एक गरीब वृद्ध पिता के पास अपने अंतिम समय में दो बेटों को देने के लिए मात्र एक आम था । पिताजी आर्शीवाद स्वरूप दोनों को वही देना चाहते थे, किंतु बड़े भाई ने आम हठपूर्वक ले लिया । रस चूस लिया छिल्का अपनी गाय को खिला दिया । गुठली छोटे भाई के आँगन में फेंकते हुए कहा- ' लो, ये पिताजी का तुम्हारे लिए आशीर्वाद है ।'
छोटे भाई ने ब़ड़ी श्रद्धापूर्वक गुठली को अपनी आँखों व सिर से लगाकर गमले में गाढ़ दिया । छोटी बहू पूजा के बाद बचा हुआ जल गमले में डालने लगी। कुछ समय बाद आम का पौधा उग आया, जो देखते ही देखते बढ़ने लगा । छोटे भाई ने उसे गमले से निकालकर अपने आँगन में लगा दिया ।
कुछ वर्षों बाद उसने वृक्ष का रूप ले लिया । वृक्ष के कारण घर की धूप से रक्षा होने लगी, साथ ही प्राणवायु भी मिलने लगी । बसंत में कोयल की मधुर कूक सुनाई देने लगी । बच्चे पेड़ की छाँव में किलकारियाँ भरकर खेलने लगे ।
पेड़ की शाख से झूला बाँधकर झूलने लगे। पेड़ की छोटी-छोटी लक़िड़याँ हवन करने एवं बड़ी लकड़ियाँ
घर के दरवाजे-खिड़कियों में भी काम आने लगीं । आम के पत्ते त्योहारों पर तोरण बाँधने के काम में आने लगे । धीरे-धीरे वृक्ष में कैरियाँ लग गईं । कैरियों से अचार व मुरब्बा डाल दिया गया । आम के रस से घर-परिवार के सदस्य रस-विभोर हो गए तो बाजार में आम के अच्छे दाम मिलने से आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई। रस से पाप़ड़ भी बनाए गए, जो पूरे साल मेहमानों व घर वालों को आम रस की याद दिलाते रहते । ब़ड़े बेटे को आम फल का सुख क्षणिक ही मिला तो छोटे बेटे को पिता का 'आशीर्वाद' दीर्घकालिक व सुख- समृद्धि दायक मिला ।
यही हाल हमारा भी है परमात्मा हमे सब कुछ देता है सही उपयोग हम करते नही हैं दोष परमात्मा और किस्मत को देते हैं ।।



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