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Sunday, May 29, 2016

पागल बाबा



कृष्णभक्तों में खासतौर पर बिहारीजी के भक्तों में एक
कथा प्रचलित है। एक गरीब ब्राह्मण बांके बिहारी का
भक्त था। एक बार उसने किसी महाजन से कुछ रुपये उधार
लिए। हर महीने वह थोड़ा-थोड़ा करके कर्ज चुकाया।
आखिरी किस्त के पहले महाजन ने उसे अदालती नोटिस
भिजवा दिया कि उधार बकाया है और पूरी रकम व्याज
सहित वापस करे।
ब्राह्मण परेशान हो गया। महाजन के पास जा कर उसने बहुत
सफाई दी पर कोई असर नहीं हुआ। मामला कोर्ट में पहुंचा।
कोर्ट में भी ब्राह्मण ने जज से वही बात कही, मैंने सारा
पैसा चुका दिया है। जज ने पूछा, कोई गवाह है जिसके
सामने तुम महाजन को पैसा देते थे। कुछ सोचकर उसने
बिहारीजी मंदिर का पता बता दिया।
अदालत ने मंदिर का पता नोट करा दिया। अदालत की
ओर से मंदिर के पते पर सम्मन जारी कर दिया गया। वह
नोटिस बिहारीजी के सामने रख दिया गया। बात आई
गई हो गई। गवाही के दिन एक बूढ़ा आदमी जज के सामने
गवाह के तौर पर पेश हुआ। उसने कहा कि पैसे देते समय मैं साथ
होता था और इस-इस तारीख को रकम वापस की गई थी।
जज ने सेठ का बही- खाता देखा तो गवाही सही
निकली। रकम दर्ज थी, नाम फर्जी डाला गया था। जज
ने ब्राह्मण को निर्दोष करार दिया। लेकिन उसके मन में
यह उथल पुथल मची रही कि आखिर वह गवाह था कौन।
उसने ब्राह्मण से पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि
बिहारीजी के सिवा कौन हो सकता है।
इस घटना ने जज को इतना विभोर कर दिया किया कि
वह इस्तीफा देकर, घर-परिवार छोड़कर फकीर बन गया।
कहते है कि वही न्यायाधीश बहुत साल बाद पागल बाबा
के नाम से वृंदावन लौट कर आया।
आज भी वहां पागल बाबा का बनवाया हुआ बिहारी
जी का एक मंदिर है
जिसमें श्रीश्रीराधा-गोविन्द, श्रीश्रीनिताई-गौर
श्रीदुर्गा एवं श्रीमहादेव जी विराजमान हैं।

पागल बाबा की दिनचर्या में एक अद्भुत चीज़ शामिल
थी - उनकी भोजन पद्धति।
वो प्रतिदिन जो साधु संतो का भंडारा होता उसके
बाहर जाते वहाँ पर उनकी जूठन बटोरते फिर उसका आधा
प्रभु द्वारिकाधीश को अर्पित करते और आधा स्वयं
खाते। उनको लोग बड़ी हेय द्रष्टि से देखते थे पागल तो
आखिर पागल।
पर प्रभु तो प्रेम के भूखे है,
एक दिन सभी साधुओं ने फैसला किया आज देर से भोजन
किया जायेगा और कुछ जूठन भी नहीं छोड़ी जाएगी।
पागल बाबा भंडारे के बाहर बैठे इंतज़ार कर रहे थे की कब जूठे
पत्तल फेंके जायें और वो भोजन करें। इसी क्रम में दोपहर हो
गयी वो भूख से बिलखने लगे।
दोपहर के बाद जब बाहर पत्तल फेंके गए तो उनमें कुछ भी
जूठन नहीं थी ।उन्होंने बड़ी मुश्किल से एक एक पत्तल पोछ
कर कुछ जूठन इकट्ठी की अब शाम हो चुकी थी। वो अत्यंत
भूखे थे।
उन्होंने वो जूठन उठाई और अपने मुह में डाल ली। पर मुँह में
उसको डालते ही उनको याद आया कि अरे! आज तो
बाँकेबिहारी को अर्पित किये बिना ही भोजन, ऐसा
कत्तई नहीं होगा।
अब उनके सामने बड़ी विषम स्थिति थी वो भोजन को
अगर उगल देंगे तो अन्न का तिरस्कार और खा सकते नहीं
क्योकि प्रभु को अर्पित नहीं किया। इसी कशमकश में वो
मुख बंद कर के बैठे रहे और प्रभु का स्मरण करते रहे, वो निरंतर
रोते जा रहे थे की प्रभु इस विपत्ति से कैसे छुटकारा पाया
जाये।
पर श्रीठाकुर तो सबकी लाज रखते हैं-
रात को बाल रूप में उनके पास आये और बोले क्यों रोज़
सबका जूठा खिलाते हो और आज अपना जूठा खिलाने में
संकोच कर रहे हो।
उनकी आँखों से निरंतर अश्रु निकलते जा रहे थे। प्रभु ने
उनकी गोद में बैठ कर उनका मुख खोला और कुछ भाग
निकाल कर बड़े प्रेम से उसको खाया। अब पागल बाबा
को उनकी विपत्ति से छुटकारा मिला।
ऐसे परम भगवद्भक्त थे श्रीलीलानन्द ठाकुर (पागल बाबा)।
लाडली के लाड़ में, लाडलो बिगर गयो
इस लाड़ की लडाई में, बृज में प्रेम बिखर गयो
इस प्रेम के बिखराव में, लुटे सब रसिक जन
सब सुध बुध खोकर, मैं भी पागल है गयो

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