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Monday, October 24, 2016

शक्कर वाली चींटी

एक बार चींटियों की जमातें
इकट्ठी हुईं। एक जमात वाली चींटी दूसरी
जमात की चींटी से कहने लगीः "हम तो बड़े मजे
से शक्कर के पहाड़ पर जीते हैं। चलो शक्कर पर...
खाओ शक्कर.... रहो शक्कर पर..." तब नमक के
पहाड़ पर रहने वाली चींटी ने कहाः "शक्कर
कहाँ है? यहाँ नमक ही नमक है।"
तब शक्कर के पहाड़ वाली चींटी बोलीः
"चलो हमारे साथ।"
ऐसा कहकर वह शक्कर वाली चींटी उस नमक
वाली चींटी को अपने साथ शक्कर के पहाड़ पर
ले गयी। तब नमकवाली चींटी बोलीः
"तुम को बड़ी बड़ाई हाँक रही थी कि बड़ी
मिठास है, बड़ी मधुरता है.... यहाँ तो कोई
मधुरता नहीं है।"
शक्कर वाली चींटी नें ध्यान से देखा तो नमक के
पहाड़वाली चींटी के मुँह में नमक की छोटी-
सी डली देखी। तब वह बोलीः
"अरे ! मुँह में तो नमक की डली रखी हुई है, फिर
शक्कर की मिठास कहाँ से मिलेगी।?"
ऐसे ही हमारे चित्त में वासना, अहंकार,
ममतादिरूपी नमक की डली भरी हुई है तो फिर
परमात्मरूपी शक्कर का रस कैसे मिले?
परमात्मरसरूपी शक्कर की मिठास का अनुभव तो
तभी हो सकता है जब संसाररूपी नमक की डली
के आकर्षण और वासना को छोड़ दिया जाये।
किन्तु होता क्या है? "हे सिनेमा ! तू सुख दे... हे
फेन्टा ! तू सुख दे... हे टी.वी. ! तू सुख दे.... हे
रेडियो ! तू सुख दे..." अरे ! सबको सुख का दान
करने वाले आप भिखारी हुए जा रहे हो? आपमें
तो इतना सुख है, इतना प्रेम है, इतनी शक्ति है,
इतना आनन्द है कि आप संसार को भी आनंद दे
सकते हो और परमात्मा को भी खुश कर सकते हो।
आप संसार से सुख लेने के लिए आये हो यह गलती
निकाल दो, बस। आप कुछ करके, कुछ खाकर, कुछ
पहनकर, कहीं जाकर, कुछ पाकर सुखी होगे यह
भ्रांति निकाल दो और जहाँ हो वहीं अपने
आत्मस्वरूप में जाग जाओ, बस। अगर आपने इतना
कर लिया तो समझो कि सब कुछ कर लिया...
सब कुछ पा लिया।🍁🍁



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