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Monday, January 7, 2019

प्रयागराज कुम्भ -2019 -विशेष--

कुम्भ : परंपरा, इतिहास एंव वर्तमान

प्रिय मित्रों/पाठकों, परम्पराओं और संस्कृति के बारे में कहा जाता है कि ये आसानी से खत्म नहीं होती, बल्कि समय के बदलाव के साथ खुद को ढालकर नए ढंग से हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। भारत का विश्व प्रसिद्ध कुंभ मेला इस बात की पुष्टी करते हुए, परम्परा में आधुनिकता का अद्भुत संगम होने जा रहा है।

यहाँ यह भी एक सर्वमान्य तथ्य है कि संस्कृतियों के पनपने में मेलों और विभिन्न पर्वों का विशेष योगदान है। यदि हम यह कहें कि तीज-त्यौहारों और मेलों आदि ने ही सच्चे अर्थों में हमारे सांस्कृतिक विकास में मदद दी है और उसे हर पल जीवंत बनाये रखा है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। एक ऐसा ही पर्व-कुम्भ मेला पुनः हमारे सामने है जो सिर्फ हिन्दु संस्कृति का ही नहीं वरन पूरे भारतवर्ष की समस्त संस्कृतियों के उनयन का प्रबल प्रतीक है। इस बार जन-जन का यह पर्व कुछ विशिष्टता लिये हुये है। यह इस शताब्दी का अन्तिम कुम्भ पर्व भी है। इस कारण इसे देखने-परखने और अगली सदी के कुम्भ पर्वों की तैयारियों के लिये पर्व का आकलन करने के उद्देश्य से भी यह कुम्भ मेला महत्त्वपूर्ण है।

प्रयागराज का 2019 का कुंभ लोगों के स्वागत के लिए पूरे तामझाम के साथ तैयार रहेगा। इलाहाबाद में आस्था के महाकुंभ का आगाज होने वाला है। 55 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व के पहले दिन मकर संक्रांति के दिन संगम तट पर श्रद्धालु डुबकी लगाएंगे. सारे अखाड़ों का शाही स्नान भी इसी दिन होगा।

कुम्भ शब्द का अर्थ ही होता है अमृत का घड़ा यानि ज्ञान का घड़ा और कुम्भ प्रथा से स्पष्ट अभिप्राय है , ज्ञान के घड़े का सदुपयोग. हमारा राष्ट्र भारत आदिकाल से ही संतो, ऋषियों और मुनियों की धरती रही है. इस देश की धरती ने कालिदास जैसे मूर्खो को भी ज्ञानी बनाया है. भारत राष्ट्र पूरे विशव को अज्ञानता रूपी अंधकार से ज्ञानरुपी प्रकाश की और ला रहा है . जिससे विश्व गुरू से भी यह राष्ट्र विभूषित हुआ है. जिस समय यूरोप के लोग जंगलो में निर्वस्त्र भ्रमण करते हुए कच्चा मास खाते थे. उस समय इस देश में गंगा सिन्धु के तटों पर बच्चे बच्चे वेद पुरानो को कंटस्थ करते थे. कुम्भ प्रथा भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है.

स्कंध पुराण और रुद्रयामल तंत्र और अन्य अनेक ग्रंथो में वर्णित है की किसी समय देश के 12 स्थानों पर कुम्भ का आयोजन होता था. वैदिक युग में सिमरिया (बिहार), गुवाहाटी (असम), कुरुक्षेत्र (हरियाणा), पूरी (ओडिशा), गंगा सागर (बंगाल), द्वारिका (गुजरात), कुम्भ्कोनाम (तमिलनाडु), रामेश्वरम (तमिलनाडु), हरिद्वार (उत्तराखंड), प्रयाग (उत्तर प्रदेश), उज्जैन (मध्य प्रदेश), नासिक (महाराष्ट्र) लेकिन दुःख के साथ ये कहना पड़ता है की नियति के चक्र, विदेशी कुचक्रो और इन सबसे ऊपर परंपरा के प्रति भारतीयों की उदासीनता के कारण देश के सबसे बड़े इन आयाजनो में से मात्र चार (हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन एंव नासिक) को ही हम बचा पाए और 8 स्थानों पर लगने वाले कुम्भ पर्वो का लोप हो गया.

वैसे मूल संकल्पना की बात करें तो ज्योतिश में कुम्भ एक योग है. जिसमे खगोलीय रूप से जब सूर्य, चंद्रमा और ब्रहस्पति एक राशी में आते है तो कुम्भ योग बनता है, दरअसल मानव जीवन पर इन दोनों ग्रहों और चंद्रमा का विशेष प्रभाव बन गया है. और इस विशेष खगोलीय अवशता में गंगा में स्नान का महत्व 12 साल के स्नान के बराबर मन गया है. इन्ही बातो के आधार पर प्रत्येक वर्ष के 12 मास में भारत की एकता और अखंडता को ध्यान में रखते हुए देश के 12 स्थानों पर नदियों के किनारे कुम्भ का संकल्प लिया गया. वर्ष के 12 मास में, 12 राशियाँ जिनमे से प्रत्येक 12 वर्ष पर ब्रहस्पति का शुभागमन होने से 12 -12 साल के बाद महाकुम्भ का आयोजन होने लगा. इस हिसाब से एक स्थान पर 12 साल के बाद महाकुम्भ का योग होने लगा और हर साल कहीं न कहीं महाकुम्भ का योग बनता रहा. 12 मास में एक कार्तिक मास भी है जिसमे तुला संक्रांति में ब्रहस्पति का योग होने से महाकुम्भ उद्घोषित हुआ.


यह ऐतिहासिक स्वरूप उपलब्ध अभिलेखों व प्रमाणों की दृष्टि से कहीं अधिक सार्थक है। ‘प्रयागदीप’ के लेखक महाराज हर्षवर्धन और समकालीन चीनी यात्री ह्वेनसांग, जो सन 629 से 645 तक भारत भ्रमण पर रहा, से सम्बद्ध एक उल्लेख ऐसा है जिसे कुम्भ की प्राचीनता के बारे में प्रस्तुत किया जाता है। हर्षवर्धन सन 606 में कान्य-कुब्जेश्वर के महाराजा बने थे। इसी दौरान सन 634 में ह्वेनसांग प्रयाग पहुँचा। इस वर्ष प्रयाग में त्रिवेणी के तट पर उसने एक स्नान पर्व के दौरान महाराज हर्षवर्धन को अपना सर्वस्व दान करते हुये देखा। इस घटना को ह्वेनसांग ने अपने अनुभव में विस्तृत रूप से लिखा। हालाँकि इतिहासकारों में उक्त स्नान पर्व को ‘कुम्भ पर्व’ मानने के बारे में मतैक्य नहीं है फिर भी कुम्भ के इतिहास में ह्वेनसांग के उक्त संस्मरण का प्रायः उल्लेख किया जाता है। इसके पश्चात कुम्भ सम्बन्धी एक प्रमाण 13वीं सदी का मिलता है। यह उल्लेख नागा सन्यासियों और वैष्णव वैरागियों के बीच कुम्भ मेले पर हुये व्यापक संघर्ष के सम्बन्ध में है। इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक- ‘नागा सन्यासियों का इतिहास’ में इस घटना का वर्णन करते हुये उक्त कुम्भ पर्व का आयोजन वर्ष सन 1235 बताया है। इस संघर्ष में नागा सन्यासियों ने वैरागियों पर महत्त्वपूर्ण जीत दर्ज की थी।

कुम्भ सम्बन्धी एक विशुद्ध ऐतिहासिक प्रमाण यह है कि कुम्भ के महत्व को देखते हुये मुगल बादशाह अकबर ने हिन्दुओं की भावनाओं का आदर करते हुये सन 1564 में जजिया कर समाप्त कर दिया था। हालाँकि इस घटना के 110 वर्ष बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठे तत्कालीन मुगल शासक औरंगजेब ने 1678-79 में कुम्भ मेले से कुछ ही समय पूर्व जजिया कर पुनः लागू कर दिया।

कुछ धार्मिक पुस्तकों में भी कुम्भ सम्बन्धी पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। जैसे- 17वी शताब्दी के दौरान फारसी भाषा की एक धार्मिक पुस्तक - ‘दबिस्तान-ए-मुजाहिब’ में एक कुम्भ मेले पर हुये संघर्ष का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार 1640 में कुम्भ पर्व के आयोजन के समय हरिद्वार में नागा सन्यासियों और वैष्णव वैरागियों के मध्य एक बार पुनः युद्ध हुआ था। इसी प्रकार मराठी भाषा की एक पुस्तक- ‘गुरुचरित्र’ में भी 15वीं सदी में नासिक में हुये कुम्भ पर्व का वर्णन किया गया है। नासिक में खुदाई के दौरान एक ताम्रपत्र भी मिला था जिसके अनुसार सन 1690 में एक अज्ञात कारण, सम्भवतः पारस्परिक संघर्ष से हजारों की संख्या में वैरागी सम्प्रदाय के साधु मारे गये थे। हरिद्वार में कुम्भ मेले का एक प्रमाण सन 1678 की एक घटना का उल्लेख करता है। इस प्रमाण के अनुसार गुजरात के प्रमाणी संत महामति प्राणनाथ यहाँ के कुम्भ मेले में अपने तमाम शिष्यों सहित सम्मिलित हुये और यहाँ के विद्वानों से शास्त्रार्थ करके उन्होंने ‘निष्कलंक बुद्ध’ की पदवी प्राप्त की।

भारत अगर आज कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी और गुजरात से ले कर गुवाहाटी तक एक राष्ट्र है तो ये किसी राजनितिक एंव प्रशासनिक व्यवस्था के कारण नहीं बल्कि इस देश की धर्म प्राण संस्कृति के कारण है. इतिहास में भी सैकड़ो राजाओ के होते हुए भी ये एक ही राष्ट्र था. इस धर्म प्राण देश की तासीर को समझने वाले कहते है की कुम्भपर्व की परंपरा का लोप होना भारत की सबसे बड़ी हानी है. सिर्फ यही नहीं देश के अन्दर और बहार के प्रत्यक्ष और परोक्ष कई आघातों ने धर्म से जुड़े हमारे मूल्यों और परम्परो को प्रभावित करने की कोशिशे की और किसी रूप में ये आज भी जरी है. पर इतिहास साक्षी है की इस धर्म ध्वजा को उखाड़ने की कोशिशो को हर बार नाकामी ही मिली है .

समय चक्र के साथ बदलाव नियति का अभिन्न हिस्सा रहा है और परम्पराएं इससे अछूती नहीं रह सकती. कुम्भ पर्व के साथ भी ऐसा ही हुआ. कई कारणों से कालान्तर में सिर्फ चार स्थानों पर ही कुम्भपर्व बचा रह पाया और बाकि जगहों पर या तो इसका लोप हो गया या फिर परम्पराव में परिवर्तन हो गया .

वर्तमान में चार कुम्भो के बाद सबसे सटीक कुम्भ परंपरा कहीं पर बची है तो वो तमिलनाडु के कुम्भ्कोनम में विदमान है. जैसा की नाम से ही ज्ञान पड़ता है की कुम्भ के कारण ही इस जगह का नाम कुम्भ्कोनम पड़ा. कुम्भ्कोनम में आयोजित होने वाले कुम्भ को महामहम कहा जाता है. इसे दक्षिण भारत का कुम्भ भी कहा जाता है.



महामहम कुम्भ का निर्धारण भी मुख्य चारो कुम्भो की तरह खगोलीय घटनाओ के आधार पर ही होता है. महामहम पर्व के दौरान लाखो हिन्दू कुम्भाकोनम में आते है. इस पर्व की शुरुआत पवित्र महामहम कुंड में नहाने से शुरू होती है. जिसके पश्चात् तीर्थयात्री पवित्र कावेरी के घाटों पर जा कर उसमे डुबकी लगाते है. इस पर्व के दौरान कुम्भाकोनम के प्राचीन मंदिरों से देवताओ की पालकियो को निकाला जाता है. एवं पूरी की रथयात्रा की तर्ज पर एक विशाल रथयात्रा यहाँ भी निकली जाती है. धार्मिक ग्रंथो में कुम्भाकोनम को काशी से भी पवित्र बताया गया है.
पौराणिक महत्व

पर्व जितना पुरातन माना जाएगा, उसकी आधार गाथाएँ भी उतनी ही प्राचीन ठहरेंगी। यही कारण है कि इस प्राचीन पर्व-कुम्भ की मान्यताओं की बेल वेद-पुराणों के पृष्ठों तक पहुँचती है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में ‘कुम्भ’ शब्द की व्याख्या करते हुये कुछ ऐसे मन्त्र मिलते हैं जिन्हें परोक्षतः कुम्भ पर्व से जोड़ा जाता है अथर्ववेद के काण्ड-19, सूक्त-53 के तीसरे मन्त्र में कुम्भ के बारे में कहा गया है-

पूर्ण कुम्भोऽधि कालं आहितस्तं, वै पश्यामो बहुधानु संतः।
स इमा विश्वास भुवनानि प्रत्यंड, कालं तमाहुः परमे व्योमन्।।

अर्थात काल यानी समय के ऊपर भरा हुआ कुम्भ रखा हुआ है और हम उस घड़े को विविध दृष्टियों से देखते हैं। ऐसे में वह अर्थात समय सभी सत्ता वालों के सम्मुख चलता है। उस काल को लोग अति उच्च रक्षा स्थान में बताते हैं।

वेदों में कुम्भ सम्बन्धी जो भी उल्लेख हैं वे प्रायः सांकेतिक ही हैं और उनसे कुम्भ पर्व की स्पष्ट व्याख्या नहीं मिलती। ऐसे में पुराण सामने आते हैं। पुराणों में विभिन्न कथाओं के माध्यम से कुम्भ पर्व की मान्यताएँ स्थापित की गई हैं। पुराणों में जो कथाएँ वर्णित हैं वे स्पष्ट करती हैं कि कुम्भ पर्व कैसे प्रारम्भ हुआ। ऐसी कथाओं में ‘श्रीमद्भागवतपुराण’, व ‘स्कंध पुराण’ के कुम्भ प्रसंग उल्लेखनीय हैं। श्रीमद्भागवतपुराण में सागर-मंथन की जो कथा मिलती है वह प्रायः सभी सम्बन्धित पुराणों में समान रूप से थोड़े-बहुत फेर बदल के साथ विद्यमान है। इस कथा के अनुसार देवासुर संग्राम के मध्य अमृत प्राप्ति के ध्येय को लेकर सागर मंथन की प्रक्रिया सम्पन्न हुई। सागर मंथन के फलस्वरूप जो चौदह रत्नक्रमशः कालकूट विष, कामधेनु गाय, कल्पवृक्ष, पारिजात वृक्ष, कौस्तुभ मणि, उच्चैश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, रंभ अप्सरा, वारुणि, लक्ष्मी, चंद्रमा, शंख, वैद्यराज धन्वंतरि एवं अमृत निकले, उनमें पहले ही रत्न अर्थात विष ने समस्त ब्रह्मांड में हाहाकार मचा दिया।

तब भगवान शंकर ने उसे अपने कंठ में स्थान दिया और संसार को उसके भय से मुक्त कर दिया। शेष अन्य रत्नों पर तो नहीं किन्तु अमृत की प्राप्ति को लेकर देवताओं और असुरों में एक बार पुनः विवाद उत्पन्न हो गया। इस अमृत कुम्भ से अमृत देवलोक और भूलोक के कुल बारह स्थानों पर कैसे छलक कर गिरा, इस सन्दर्भ में दो-तीन पुराण कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें से एक ‘भगवान पुराण’ के कथानुसार आचार्य बृहस्पति का संकेत पाकर इन्द्र-पुत्र जयंत अमृत-घट छीनने में सफल रहा और उसे लेकर चतुर्दिक ब्रह्मांड में भागने लगा। दैत्य भी उसके पीछे भागे और इस प्रकार कुल बारह दिनों तक उनमें परस्पर संघर्ष होता रहा। इस संघर्ष के दौरान ही आकाश यानी देवलोक के आठ स्थानों और भूलोक के चार स्थानों- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में अमृत की कुछ बूँदें छलक कर गिर पड़ी। जिन घट-पलों में ये अमृतकण इन स्थानों पर गिरे, उन घड़ियों और नक्षत्रा-योगों में ये चारों स्थान अमृत-तुल्य कुम्भ-तीर्थ बन गये और यहाँ कुम्भ पर्व मनाने की परम्परा विकसित हो गई। सागर मंथन की कथा का उल्लेख ‘स्कंध पुराण’ में भी देखने को मिलता है।

खगोलशास्त्रीय मान्यताएँ

यह तो प्रायः स्पष्ट है कि अमृत की बूँदें गिरने के कारण ही उक्त चारों स्थान कुम्भ तीर्थ कहलाये लेकिन यहाँ कुम्भ पर्व कब मनाया जाए- इसकी अनेक खगोलशास्त्रीय मान्यताएँ हैं। अलग-अलग स्थानों पर विविध नक्षत्र योग ही यह बताते हैं कि किस अवधि अथवा किस दिन कुम्भ पर्व मनाया जाए। जैसे हरिद्वार में कुम्भ पर्व का योग तब पड़ता है जब बृहस्पति कुम्भ राशि में हो तथा सूर्य मेषस्थ हो। ‘स्कंध पुराण’ भी इस मान्यता को पुष्ट करता है-

पद्मिनी नायके मेषे कुम्भ राशि गते गुरो।
गंगा द्वारे भवेद्योग कुम्भनान्मातदोत्तमः।।

अर्थात सूर्य मेष राशि में हो और बृहस्पति कुम्भ राशि में प्रविष्ट हो चुका हो तभी हरिद्वार में पूर्ण कुम्भ का सुयोग बनता है।

प्रयाग में यह पर्व तब पड़ता है जब सूर्य मकर राशि में और बृहस्पति वृष राशि में तथा माघ मास हो जबकि उज्जैन में इस पर्व की अवधारणा तब साकार रूप धारण करती है जब सूर्य मेष राशि में तथा बृहस्पति सिंह राशि में हो। उज्जैन में कुम्भ पर्व के लिये दस अन्य योग होना भी अनिवार्य है। बृहस्पति के सिंह राशि में होने से यहाँ का पर्व ‘सिंहस्थ पर्व’ कहलाता है। उधर नासिक में कुम्भ पर्व का आयोजन तब होता है जब सूर्य और बृहस्पति दोनों ही सिंह राशि में हों। इसके अतिरिक्त पूर्णिमा की तिथि और दिन बृहस्पतिवार होना भी यहाँ के पर्व के लिये एक अनिवार्य शर्त है।

यहाँ एक ओर तथ्य उल्लेखनीय है कि चारों स्थानों पर कुम्भ पर्व के लिये जो नक्षत्र-योग निर्धारित किये गये हैं उनमें सर्वप्रमुख भूमिका बृहस्पति की है। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि समस्त योग बृहस्पति की चाल और राशियों में उसकी स्थिति पर निर्भर करते हैं। अब चूँकि बृहस्पति 4332.5 दिनों अर्थात 11 वर्ष 11 महीने और 27 दिनों में सभी 12 राशियों में अपनी परिक्रमा पूरी करता है अतः इस वजह से सामान्यतः 48 कुम्भ पर्वों की अवधि में इसकी परिक्रमा 6 वर्ष पहले पूरी हो जाती है। इस कारण प्रत्येक शताब्दी में कोई एक कुम्भ, सामान्यतः हर आठवाँ कुम्भ बारह वर्ष के स्थान पर ग्यारह वर्ष में ही पड़ जाता है।

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महानिर्वाणी अखाड़ा वैदिक हिंदू परंपराओं के आधार पर स्थापित अखाड़ों में तीसरा सबसे बड़ा अखाड़ा है. यह एक शैव अखाड़ा है. इस अखाड़े के पूज्य साधुओं में से कपिल मुनि प्रमुख हैं. उन्हें ही नागा परंपरा को शुरू करने वाला भी माना जाता है. इसे अखाड़ों में सबसे पुराना माना जाता है, कहा जाता है यह अखाड़ा पहले से ही स्थापित था. आदि शंकराचार्य ने अपने जीवनकाल में इसका फिर से संगठन किया था.

 महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा का जिम्‍मा इसी अखाड़े के पास है. यह परंपरा पिछले कई साल से चली आ रही है. प्रयाग और वाराणसी इस अखाड़े के प्रमुख केंद्र रहे हैं. इसके बाद हरिद्वार को इसके संतों ने अपना प्रमुख केंद्र बनाया. ओंकारेश्वर और नासिक भी इनके प्रमुख केंद्र हैं.
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महानिर्वाणी अखाड़े में कौन से साधु होते हैं प्रमुख?
इस अखाड़े के प्रमुख को आचार्य महामंडलेश्वर की उपाधि से जाना जाता है. उनका चुनाव अखाड़े के ही महामंडलेश्वर करते हैं. और एक बार चुने जाने के बाद साधु इस पद पर जीवनभर बने रहते हैं. फिलहाल इस अखाड़े में 46 महामंडलेश्वर हैं. इसके अलावा अखाड़े में सचिव, श्रीमहंत, महंत, कारोबारी/कोठारी और थनपति/थानेदार. अखाड़े के पांच प्रमुख साधुओं को पंचेश्वर भी कहा जाता है, जिन्हें हर कुंभ में चुना जाता है.अखाड़े के सचिव श्री रमेशगिरीजी महाराज हैं. परमहंस नित्यानंद इस अखाड़े के प्रमुख 2013 में नियुक्त किए गए थे. उन पर यौन शोषण के आरोप थे. प्रसिद्ध दाती महाराज को भी इस अखाड़े की सदस्यता मिल गई थी. हालांकि बाद में उनसे इसकी सदस्यता ले ली गई थी.
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महानिर्वाणी अखाड़े की पेशवाई कैसे निकाली जाती है?

जब महानिर्वाणी अखाड़े की पेशवाई निकाली जाती है तो सबसे आगे अखाड़े का ध्वज होता है. उसके पीछे नागा सन्यासियों का समूह करतब दिखाते आगे-आगे बढ़ता है. रथ पर आरूढ़ आराध्य कपिल मुनि की मूर्ति थी जिसपर महात्मा चंवर डुलाते हैं. बीच-बीच में रथ पर सवार साधु-महात्मा दर्शन के लिए कतार में खड़े श्रद्धालुओं पर जल में डुबोकर फूल बरसाते हैं.नागा साधुओं ने अपने अस्त्र शस्त्र के साथ पेशवाई के बीच में जगह-जगह रुककर युद्ध कौशल का भी प्रदर्शन करते हैं. सड़क के दोनों किनारो पर दो घोड़ों पर सवार दो नागा सन्यासी नगाड़ा बजाते हुए चलते हैं. इसके बीच में साधु, महात्मा, सन्यासी, नागा चलते हैं।
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